सुबह की पहली किरण जब सरयू नदी के जल को छूती है, तो ऐसा लगता है मानो स्वयं प्रभु राम धरती पर उतर आए हों। यह कोई साधारण शहर नहीं है। यह अयोध्या है—मर्यादा, धर्म, त्याग और आदर्शों की भूमि।
मैं जब पहली बार अयोध्या पहुँचा, तो मन में सिर्फ एक विचार था—क्या सच में किसी शहर की आत्मा होती है?
लेकिन अयोध्या की गलियों में कदम रखते ही इस प्रश्न का उत्तर अपने-आप मिल गया।
अयोध्या की पहली सुबह – शंखनाद और शांति
सुबह के चार बजे थे। चारों ओर हल्की ठंडक, मंदिरों से आती घंटियों की ध्वनि और “जय श्री राम” का गूंजता स्वर। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर जाग चुका हो—ईश्वर के स्वागत में।
सरयू घाट की ओर जाते हुए मैंने देखा, लोग दीप जला रहे थे, कुछ ध्यान में बैठे थे, तो कुछ मौन प्रार्थना कर रहे थे। यहाँ कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। समय जैसे थम गया हो।
सरयू मैया – जो सब कुछ अपने में समेट लेती हैं
सरयू नदी अयोध्या की आत्मा है। इसके बिना अयोध्या की कल्पना अधूरी है। मैंने नदी के किनारे बैठकर जल को छुआ। वह ठंडा था, लेकिन मन को गर्माहट दे रहा था।
कहते हैं, प्रभु श्रीराम ने वनवास जाते समय यहीं से विदा ली थी। और यहीं से उन्होंने वापस आकर अयोध्या को फिर से प्रकाश से भर दिया।
जब सूर्य धीरे-धीरे ऊपर उठा, तो जल में उसकी परछाईं ऐसी लग रही थी मानो स्वयं राम मुस्कुरा रहे हों।
राम जन्मभूमि – आस्था का केंद्र
अयोध्या आए और राम जन्मभूमि के दर्शन न हों, ऐसा कैसे हो सकता है?
मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही मन अपने-आप शांत हो गया। वहाँ खड़े हर व्यक्ति की आँखों में श्रद्धा थी, गर्व था और एक गहरी भावनात्मक शांति।
यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है।
यह विश्वास का प्रतीक है।
यह सदियों की प्रतीक्षा का उत्तर है।
यह आस्था की जीत है।
जब मैंने रामलला के दर्शन किए, तो न जाने क्यों आँखें नम हो गईं। कोई शब्द नहीं थे उस भावना को व्यक्त करने के लिए।
हनुमान गढ़ी – भक्ति और शक्ति का संगम
राम जन्मभूमि से कुछ दूरी पर स्थित हनुमान गढ़ी अयोध्या का एक प्रमुख स्थल है। कहा जाता है कि यहाँ हनुमान जी आज भी अयोध्या की रक्षा करते हैं।
सीढ़ियाँ चढ़ते समय हर कदम के साथ मन हल्का होता जा रहा था। ऊपर पहुँचते ही “जय बजरंगबली” का जयकारा गूंज उठा।
यहाँ आकर समझ आया कि भक्ति सिर्फ विनम्रता नहीं, शक्ति भी है।
अयोध्या की गलियाँ – जहाँ इतिहास चलता है
अयोध्या की गलियाँ संकरी हैं, लेकिन उनमें इतिहास बहुत चौड़ा है। हर मोड़ पर कोई कथा छुपी है, हर दीवार कुछ कहती है।
दुकानों पर रामायण की चौपाइयाँ लिखी थीं, कहीं तुलसीदास जी की पंक्तियाँ, तो कहीं राम-सीता की चित्रकारी।
यह शहर आपको पढ़ाता नहीं—यह आपको महसूस कराता है।
कनक भवन – माँ सीता का मायका
कनक भवन में प्रवेश करते ही वातावरण बदल जाता है। यह मंदिर माँ सीता और प्रभु राम को समर्पित है। कहते हैं, यह भवन माँ सीता को विवाह के बाद उपहार में मिला था।
यहाँ की सजावट, मूर्तियाँ और वातावरण—सब कुछ अत्यंत कोमल और भावनात्मक है।
यहाँ आकर प्रभु राम राजा नहीं लगते, बल्कि एक पति और पुत्र लगते हैं। और यही अयोध्या की विशेषता है—यह भगवान को भी इंसान बना देती है।
शाम की सरयू आरती – आत्मा का दीपक
शाम होते-होते मैं फिर से सरयू घाट पहुँचा। आरती की तैयारी हो रही थी। दीप, शंख, मंत्र—सब कुछ एक साथ।
जैसे ही आरती शुरू हुई, पूरा वातावरण दिव्य हो गया। सैकड़ों दीप जल में तैरते हुए ऐसे लग रहे थे जैसे आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों।
उस समय मुझे महसूस हुआ—
शांति कोई शब्द नहीं, एक अनुभव है।
अयोध्या की रात – मौन में भक्ति
रात को अयोध्या और भी सुंदर हो जाती है। हल्की रोशनी, शांत गलियाँ और कहीं-कहीं भजन की मधुर आवाज़।
मैं छत पर बैठकर आसमान देख रहा था। मन में कोई विचार नहीं था, कोई चिंता नहीं थी। बस एक अजीब-सी तृप्ति थी।
अयोध्या से विदा – लेकिन राम साथ हैं
जब लौटने का समय आया, तो मन नहीं कर रहा था। लेकिन तब समझ आया—
अयोध्या कोई जगह नहीं,
यह एक भावना है।
और भावना कभी छूटती नहीं।
आप अयोध्या से जा सकते हैं,
लेकिन राम आपके साथ चले आते हैं।
अंतिम शब्द
अयोध्या उन लोगों के लिए है जो सिर्फ घूमना नहीं, जीना चाहते हैं।
जो इतिहास नहीं, संस्कार सीखना चाहते हैं।
जो भगवान को ऊँचाई पर नहीं, अपने हृदय में बैठाना चाहते हैं।
अगर कभी जीवन में दिशाहीन महसूस करें,
तो एक बार अयोध्या ज़रूर जाइए।
शायद वहाँ आपको भी अपना उत्तर मिल जाए।

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