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कश्मीर: जहाँ वक़्त ठहर जाता है और दिल बोलने लगता है

 

कुछ यात्राएँ सिर्फ जगह बदलने के लिए नहीं होतीं,
कुछ यात्राएँ होती हैं ख़ुद से मिलने के लिए

कश्मीर की यात्रा भी कुछ ऐसी ही थी।

जब ट्रेन दिल्ली से आगे बढ़ी और पहाड़ों की परछाइयाँ खिड़की से झाँकने लगीं, तब मुझे नहीं पता था कि मैं एक जगह नहीं, बल्कि एक एहसास की ओर जा रहा हूँ। मन में डर भी था, सवाल भी—और एक अजीब-सी बेचैनी। लेकिन जैसे ही श्रीनगर की ठंडी हवा ने चेहरे को छुआ, लगा जैसे किसी ने दिल से कहा हो—
“स्वागत है… तुम सही जगह आ गए हो।”


श्रीनगर: झील के आईने में दिखता हुआ दिल

डल झील…
सिर्फ एक झील नहीं, बल्कि एक ज़िंदा कहानी।

शिकारे में बैठते ही पानी में हिलती मेरी परछाई मुझे देख रही थी—थकी हुई, सवालों से भरी हुई। आसपास पहाड़ खामोश थे, लेकिन उनकी खामोशी में भी एक सुकून था। शिकारे वाला बूढ़ा कश्मीरी मुस्कराकर बोला,
“साहब, यहाँ लोग तस्वीरें खींचते हैं… लेकिन कश्मीर यादों में बसता है।”

उसकी बात सच निकली।

जब सूरज डल झील में डूब रहा था, तो ऐसा लग रहा था जैसे आसमान भी खुद को इस पानी में संवार रहा हो। उस पल मैंने पहली बार महसूस किया—शांति कैसी होती है।

हाउसबोट में रात बिताना किसी पुराने ख़्वाब में सोने जैसा था। लकड़ी की दीवारें, धीमी रोशनी, बाहर पानी की हल्की आवाज़… और अंदर मन का शोर धीरे-धीरे शांत होता हुआ।


गुलमर्ग: बर्फ़ में लिपटी मासूमियत

अगली सुबह गुलमर्ग की ओर थी।

जैसे-जैसे रास्ता ऊपर चढ़ता गया, हर मोड़ पर बर्फ़ और गहरी होती गई। चारों ओर सफ़ेदी… इतनी कि आँखें थक जाएँ, लेकिन दिल नहीं।

गुलमर्ग में पहली बार बर्फ़ को छुआ।
वो ठंडी थी, लेकिन उसकी ठंडक में भी अपनापन था।

बच्चे बर्फ़ में खेल रहे थे, हँस रहे थे—बिना किसी डर के।
एक पल के लिए लगा जैसे दुनिया में कोई तकलीफ़ है ही नहीं।

गोंडोला राइड में ऊपर जाते हुए नीचे फैली वादियाँ किसी पेंटिंग से कम नहीं लगती थीं। लेकिन असली खूबसूरती वो नहीं थी जो आँखों को दिख रही थी—
वो थी जो दिल को छू रही थी।


पहलगाम: जहाँ नदी भी कुछ कहती है

पहलगाम पहुँचते-पहुँचते मन पूरी तरह खाली हो चुका था।

लिद्दर नदी किनारे बैठकर मैंने बहुत देर तक पानी को बहते देखा।
वो बिना रुके आगे बढ़ रहा था—ना अतीत की चिंता, ना भविष्य का डर।

एक स्थानीय बुज़ुर्ग पास आकर बैठे।
उन्होंने कहा,
“नदी हमें सिखाती है—रुकना नहीं, चाहे रास्ता पत्थरों से भरा हो।”

उनकी आँखों में दर्द भी था, सब्र भी।

पहलगाम की हरियाली, देवदार के पेड़, घोड़े की टापों की आवाज़—सब मिलकर जैसे दिल के अंदर किसी पुराने घाव पर मरहम लगा रहे हों।

उस रात मैंने बहुत सुकून की नींद सोई।
शायद इसलिए क्योंकि मन अब हल्का था।


कश्मीरी लोग: दर्द में भी मुस्कुराहट

कश्मीर सिर्फ पहाड़ों और वादियों का नाम नहीं है।
कश्मीर वहाँ के लोग हैं।

चाय की दुकान पर बैठा एक नौजवान बोला,
“हमने बहुत कुछ देखा है साहब… लेकिन मेहमान आज भी भगवान जैसे होते हैं।”

उनकी सादगी, उनकी मेहमाननवाज़ी—दिल को छू जाती है।

कश्मीरी कहवा की गर्माहट सिर्फ शरीर को नहीं, आत्मा को भी गर्म करती है।
और वाज़वान… हर स्वाद के साथ एक संस्कृति, एक इतिहास जुड़ा हुआ है।

यहाँ के लोग कम बोलते हैं, लेकिन उनकी आँखें बहुत कुछ कह जाती हैं।




डर, सच्चाई और एक बदला हुआ नज़रिया

कश्मीर आने से पहले मैंने भी बहुत कुछ सुना था—डर, खबरें, अफ़वाहें।

लेकिन यहाँ आकर समझ आया—
किसी जगह को जानने के लिए वहाँ जाना ज़रूरी होता है।

यहाँ दर्द है, हाँ।
लेकिन उम्मीद भी है।

यहाँ संघर्ष है, लेकिन साथ ही ज़िंदगी से प्यार भी।

कश्मीर ने मुझे सिखाया—
हर खूबसूरत चीज़ के पीछे एक कहानी होती है,
और हर कहानी में एक सच्चाई।


विदा… लेकिन हमेशा के लिए नहीं

जब वापसी का दिन आया, तो दिल भारी था।

श्रीनगर एयरपोर्ट की ओर जाते हुए मैंने आख़िरी बार पहाड़ों को देखा।
ऐसा लगा जैसे वो कह रहे हों—
“जाओ… लेकिन हमें भूलना मत।”

कश्मीर से मैं सिर्फ तस्वीरें नहीं लाया।
मैं साथ लाया—

  • थोड़ी शांति

  • थोड़ा साहस

  • और खुद का एक नया रूप

कुछ जगहें घूमी नहीं जातीं…
वो इंसान के अंदर बस जाती हैं।

कश्मीर भी अब मेरे अंदर है—
हर साँस में, हर खामोशी में।



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