सुबह के चार बजे थे। दिल्ली की भागदौड़ भरी ज़िंदगी से निकलकर जब मैं वृंदावन की ओर बढ़ रहा था, तब मन में कोई विशेष योजना नहीं थी। बस इतना जानता था कि कुछ समय के लिए शोर से दूर, आत्मा से मिलने जाना है। कहते हैं न, वृंदावन कोई जगह नहीं, एक अनुभव है। और यह अनुभव मुझे उस दिन मिलने वाला था।
जैसे ही गाड़ी यमुना के किनारे पहुँची, हवा में कुछ अलग ही खुशबू थी। अगरबत्ती, मिट्टी, फूल और भक्ति का अद्भुत संगम। ऐसा लग रहा था मानो समय यहीं ठहर गया हो।
पहली झलक – एक अलग ही संसार
वृंदावन की गलियों में कदम रखते ही लगा जैसे किसी दूसरी दुनिया में आ गया हूँ। संकरी गलियाँ, रंगीन मकान, दीवारों पर राधा-कृष्ण की पेंटिंग्स और हर दिशा से आती “राधे-राधे” की पुकार।
यहाँ हर कोई जल्दी में नहीं है। कोई मंदिर जा रहा है, कोई कीर्तन में डूबा है, तो कोई साधु आँखें बंद किए ध्यान में लीन है। वृंदावन में लोग नहीं चलते, यहाँ आत्माएँ बहती हैं।
बांके बिहारी जी – जहाँ भगवान भी नियम मानते हैं
सुबह का पहला दर्शन बांके बिहारी जी का था। मंदिर के बाहर लंबी कतार, लेकिन किसी के चेहरे पर थकान नहीं। सबके चेहरे पर बस एक उम्मीद – एक झलक।
जब गर्भगृह के पट खुले, तो लगा जैसे दिल की धड़कन रुक गई हो। बांके बिहारी जी की आँखों में ऐसी माया थी कि पल भर के लिए सब कुछ भूल गया। कहते हैं, यहाँ आरती नहीं होती क्योंकि भगवान को कहीं नज़र न लग जाए। यहाँ भगवान राजा नहीं, बालक हैं – नटखट, शरारती और बेहद अपने।
यमुना जी – साक्षात माँ की गोद में
मंदिर से निकलकर मैं यमुना घाट की ओर बढ़ा। सूरज निकल चुका था और उसकी सुनहरी किरणें यमुना के जल पर पड़ रही थीं। घाट पर कुछ महिलाएँ दीप जला रही थीं, कुछ साधु स्नान कर रहे थे।
मैं सीढ़ियों पर बैठ गया। यमुना की लहरों की आवाज़ कुछ कह रही थी। शायद वही लहरें जिन्होंने कान्हा को तैरते देखा होगा, वही जल जिसने उनकी बाल लीलाओं को छुआ होगा।
मन अनायास ही शांत हो गया।
वृंदावन की विधवाएँ – भक्ति की अनकही कहानी
वृंदावन सिर्फ मंदिरों और भक्ति का शहर नहीं, यह त्याग और समर्पण की भी भूमि है। यहाँ हजारों विधवाएँ रहती हैं, जिनका सहारा सिर्फ भक्ति है।
मैंने एक आश्रम में कुछ वृद्ध माताओं को भजन गाते देखा। उनके चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लेकिन आँखों में अद्भुत शांति। उनमें से एक ने मुझसे कहा—
“बेटा, यहाँ आकर दुख भी कान्हा का प्रसाद बन जाता है।”
उस पल मुझे समझ आया कि भक्ति क्या होती है।
निधिवन – जहाँ रात में आज भी रास होता है
शाम होते-होते मैं निधिवन पहुँचा। कहा जाता है कि यहाँ आज भी रात में राधा-कृष्ण रासलीला करते हैं। कोई भी सूर्यास्त के बाद यहाँ नहीं रुकता।
पेड़ भी यहाँ अजीब तरह से झुके हुए हैं, जैसे नृत्य कर रहे हों। स्थानीय लोगों ने बताया कि जो भी रात में रुकने की कोशिश करता है, वह कभी सामान्य नहीं रहता।
मैं वहाँ ज्यादा देर नहीं रुका, लेकिन दिल में एक श्रद्धा और रहस्य साथ ले आया।
प्रेम मंदिर – आधुनिकता में भी भक्ति
रात को प्रेम मंदिर पहुँचा। सफ़ेद संगमरमर से बना यह मंदिर आधुनिक होते हुए भी भक्ति से भरपूर है। रोशनी में नहाया मंदिर किसी स्वप्न सा लग रहा था।
यहाँ राधा-कृष्ण की लीलाओं को मूर्तियों के माध्यम से दर्शाया गया है। बच्चे, बुज़ुर्ग, युवा – सब मंत्रमुग्ध थे। यह प्रमाण था कि भक्ति उम्र या समय की मोहताज नहीं।
वृंदावन की रात – सन्नाटा नहीं, साधना
रात को जब मैं अपने ठहरने की जगह लौटा, तब भी कहीं न कहीं भजन की आवाज़ आ रही थी। वृंदावन में रात सन्नाटे की नहीं, साधना की होती है।
छत पर लेटकर आसमान देखा। तारों के बीच मुझे जैसे बांसुरी की मधुर तान सुनाई दी। शायद यह मेरा भ्रम था, या शायद वृंदावन का जादू।
सुबह की परिक्रमा – हर कदम एक प्रार्थना
अगली सुबह मैंने वृंदावन परिक्रमा शुरू की। नंगे पाँव चलते श्रद्धालु, हाथ में माला, मुख पर “राधे-राधे”।
यह परिक्रमा सिर्फ रास्ता नहीं, यह आत्मा की यात्रा है। हर कदम पर अहंकार थोड़ा-थोड़ा कम होता जाता है।
वृंदावन से विदा – लेकिन साथ ही साथ
जब वापसी का समय आया, तो मन भारी हो गया। लगा जैसे कुछ यहीं छूट रहा है। लेकिन तभी एहसास हुआ—
वृंदावन कहीं बाहर नहीं, अब भीतर बस चुका है।
यह जगह आपको बदल देती है। बिना कुछ कहे, बिना कुछ मांगे।
अंत में…
वृंदावन उन लोगों के लिए है जो भगवान को मंदिर में नहीं, जीवन में खोजना चाहते हैं। यहाँ आकर आप समझते हैं कि प्रेम, भक्ति और शांति क्या होती है।
अगर जीवन में कभी बहुत शोर हो जाए, मन भारी हो जाए, तो बस एक बार वृंदावन आ जाना।
शायद आपको भी कान्हा की मुस्कान दिख जाए।
राधे-राधे।

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